आज की सबसे ख़तरनाक आदत क्या है?
धूम्रपान? शराब? जंक फूड?
नहीं.
सबसे ख़तरनाक है “Social Validation Addiction” —
वह लत जो दिखती नहीं है, पर अंदर से इंसान को खोखला करती रहती है।
हम हर सुबह उठते ही फोन चेक करते हैं,
पहला सवाल —
“कितने likes आए?”
दूसरा सवाल —
“कितनों ने story reply की?”
और अगर engagement उम्मीद से कम हो जाए,
तो ऐसा लगता है जैसे हम कमज़ोर पड़ गए हों…
जैसे हमारी value किसी invisible scoreboard पर गिर गई हो।
लेकिन असली सवाल यह नहीं कि validation की चाह क्यों है।
असली सवाल यह है —
“इस addiction का असली दोषी कौन है? हम… या society?”
1. Society का अनकहा दबाव
Society ने एक नया rule बना दिया है—
“तुम उतने अच्छे हो, जितने तुम्हारे followers हैं।”
आज character से ज्यादा महत्व मिलता है
highlighted stories, curated lifestyle,
और दिखावटी happiness को।
– अच्छे कपड़े पहनो
– aesthetic फोटो डालो
– reels पर perfect act करो
– trending sound use करो
– हर moment को post बनाओ
यह pressure subtle है, लेकिन तेज़ी से बढ़ता है।
जो नहीं दौड़ता, वह पीछे छूट जाता है।
Society ने एक ऐसा invisible mirror दे दिया है
जिसमें देखने पर इंसान हमेशा खुद को कमतर ही पाता है।
2. हमारी अपनी कमजोरियाँ
सच यह भी है कि दोष केवल society का नहीं है।
हम खुद भी validation के बिना अधूरे महसूस करने लगे हैं।
क्यों?
क्योंकि हम अपनी self-worth
दूसरों के reactions में नापने लगे हैं।
– एक post को कम like मिले
तो दिल बैठ जाता है
– किसी दोस्त ने देख कर ignore कर दिया
तो पूरा दिन खराब
– दूसरों की खुशी देखकर
अपनी खुशी बेकार लगने लगती है
हमने real-life emotions को
digital responses से replace कर दिया है।
यह addiction खतरनाक इसलिए है
क्योंकि यह चुपचाप हमारी identity बदल देती है।
3. असली दोषी कौन?
यह blame-game नहीं है।
असलियत यह है—
समस्या दोनों हैं।
– Society unrealistic standards बनाती है
– हम उन standards को हासिल करने के लिए
अपनी authenticity छोड़ देते हैं
Society validation मांगती है,
और हम validation देने का इंतज़ार करते रहते हैं।
दोनों मिलकर एक ऐसा loop बनाते हैं
जिससे निकलना आसान नहीं होता।
4. समाधान कहाँ है?
इस लत की जड़ में है comparison
और इसका इलाज है self-awareness।
कुछ सवाल अपने आपसे रोज पूछें:
– मैं यह पोस्ट किसके लिए डाल रहा हूँ?
– मुझे खुशी ज्यादा चाहिए या validation?
– मैं तुलना क्यों कर रहा हूँ?
– क्या मेरी लाइफ को बेहतर बनाने में ये likes सच में कोई भूमिका निभाते हैं?
सच यह है —
हम खुद को validate करना सीख लें,
तो दुनिया की validation की ज़रूरत अपने आप कम हो जाएगी।
5. अंतिम विचार
Social validation addiction कोई छोटी समस्या नहीं है।
यह हमारी सोच, व्यवहार, decision-making और relationships तक को बदल देता है।
अब वक्त है खुद से पूछने का—
मैं validation ले रहा हूँ… या validation मुझे चला रहा है?
मैं society को follow कर रहा हूँ… या society मुझे control कर रही है?
जब तक हम यह जवाब ईमानदारी से नहीं ढूँढेंगे,
तब तक हम इस digital दौड़ के puppet बने रहेंगे।
वक्त है खुद को वापस पाने का।
वक्त है अपनी worth खुद तय करने का।
क्योंकि असली value हमेशा स्क्रीन के बाहर होती है।

