आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में पैसा कमाना ज़रूरी है, लेकिन इतना भी नहीं कि वही पैसा हमारे चैन, हमारी नींद और हमारा सुकून छीन ले। अक्सर हम इस डर में जीते हैं कि कहीं कम पड़ न जाए, कहीं पीछे न रह जाएँ… और इसी चक्कर में खुद को इतना थका देते हैं कि रात भर करवटें बदलते रहते हैं।
पर ज़रा सोचिए—
अगर कमाई हुई रकम से नींद ही नहीं मिलती, तो उस पैसे का मतलब क्या रहा?
तनाव ऐसा बोझ है जो धीरे-धीरे भीतर को खा जाता है। काम की चिंता, भविष्य की चिंता, जिम्मेदारियों का दबाव… सब मिलकर हमें उस मोड़ पर ले आते हैं जहाँ हम खुद को भूल जाते हैं। लेकिन ज़िंदगी सिर्फ दौड़ नहीं है, यह रुककर साँस लेने का नाम भी है।
कमाई बढ़ाने की कोशिश कीजिए, पर अपनी शांति की कीमत पर नहीं।
कहीं ऐसा न हो कि हम पैसे तो जमा करते जाएँ, लेकिन मन खाली होता जाए।
क्योंकि जिसे हम सुख के लिए कमाते हैं, वही पैसा अगर हमारी नींद खरीदने लगे, तो यह कमाई नहीं, एक धीमी बर्बादी है।
खुद को थोड़ा सँभालिए, थोड़ा रुकिए, और याद रखिए—
पैसा फिर से कमाया जा सकता है, पर खोई हुई शांति वापस पाना सबसे मुश्किल होता है।

