Office Gossip: कभी Fun, कभी Pain
ऑफिस को अक्सर हम काम की जगह मानते हैं—जहाँ targets होते हैं, deadlines होती हैं, meetings और reports होती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ऑफिस सिर्फ़ काम की जगह नहीं, बल्कि एक छोटी-सी society है। यहाँ अलग-अलग सोच, ambition, insecurity और competition साथ-साथ चलते हैं। और इसी माहौल में एक चीज़ बहुत naturally जन्म लेती है—office gossip।
शुरुआत में gossip बिल्कुल harmless लगता है। चाय या coffee के साथ हल्की-फुल्की बातें, किसी policy को लेकर अंदाज़े, किसी colleague की promotion की चर्चा—सब कुछ इतना normal लगता है कि हमें एहसास ही नहीं होता कि हम कब इसका हिस्सा बन गए। उस वक्त gossip fun होता है। थोड़ी boredom टूटती है, bonding महसूस होती है, और लगता है कि हम “office ke andar ki baatein” जान रहे हैं।
लेकिन यही gossip धीरे-धीरे shape बदलने लगता है। facts में assumptions जुड़ने लगते हैं, opinions सच की तरह पेश होने लगते हैं, और बातें corridors से निकलकर perceptions में बदल जाती हैं। यहीं से problem शुरू होती है। क्योंकि office में perception अक्सर performance से ज़्यादा तेज़ी से फैलती है।
जब gossip pain बनता है, तो उसका असर सिर्फ़ बातों तक सीमित नहीं रहता। किसी की image खराब हो जाती है, trust टूटने लगता है, और workplace unsafe महसूस होने लगता है। सबसे ज़्यादा नुकसान तब होता है जब आपको पता चलता है कि आपके बारे में बातें चल रही थीं—और आप आख़िरी इंसान हैं जिसे यह जानकारी मिली। उस वक्त न सिर्फ़ career पर सवाल उठता है, बल्कि self-confidence भी हिल जाता है।
Office gossip का सबसे dangerous पहलू यह है कि यह अक्सर power dynamics से जुड़ा होता है। Strong position वाला gossip ज़्यादा दूर तक जाता है, और कमजोर position वाला gossip से ज़्यादा hurt होता है। कई बार बिना किसी इरादे के कही गई बात भी किसी के लिए long-term damage बन जाती है।
अक्सर लोग कहते हैं—“मैं तो बस सुन रहा था।”
लेकिन सच्चाई यह है कि चुप रहकर सुनना भी participation ही है। Gossip इसलिए ज़िंदा रहता है क्योंकि उसे audience मिलती है। अगर सुनने वाले न हों, तो बातें वहीं खत्म हो जाएँ।
Psychology की नज़र से देखें तो gossip insecurity, boredom, belongingness और control की चाह से पैदा होता है। कोई खुद को बेहतर महसूस करने के लिए gossip करता है, कोई group का हिस्सा बनने के लिए, और कोई information को power समझकर। वजह अलग-अलग हो सकती है, लेकिन असर लगभग हमेशा negative ही होता है।
Career के अलग-अलग stages में gossip का role भी बदलता रहता है। शुरुआती दौर में यह confusion पैदा करता है, mid-career में competition और politics को हवा देता है, और senior level पर यह subtle लेकिन ज़्यादा harmful हो जाता है। यहाँ शब्द नहीं, संकेत hurt करते हैं।
इस सबसे बचने का एक ही practical तरीका है—boundaries। हर बात में शामिल होना ज़रूरी नहीं। हर discussion पर opinion देना भी ज़रूरी नहीं। Neutral रहना, facts पर टिके रहना और अपने काम को बोलने देना—यही gossip का सबसे मजबूत जवाब है।
आख़िर में एक कड़वी लेकिन सच्ची बात—
आज जो आपके साथ बैठकर किसी और की बातें कर रहा है, वही कल किसी और के साथ बैठकर आपकी बातें भी करेगा। Gossip loyalty नहीं पहचानता, सिर्फ़ मौका पहचानता है।
Office gossip पूरी तरह खत्म नहीं होगा। लेकिन अगर हम यह समझ लें कि थोड़े से fun के बदले लंबा pain मिल सकता है, तो शायद हम ज़्यादा consciously choose करना सीख जाएँ।
क्योंकि career लंबी race है—और reputation वहाँ सबसे कीमती asset होती है।
Office Gossip —
कभी fun, कभी pain,
लेकिन हमेशा एक reminder कि
professional रहना ही असली strength है।

