A middle-class family looking at a distant house symbolizing rising prices and unreachable dreams
सपना सबका है, पर महंगाई ने दूरी बढ़ा दी है।

घर… जो सपना तो सबका है, पर हकीकत सिर्फ कुछ ही की बन पाती है

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घर खरीदना हमेशा से हमारे समाज में सबसे बड़ा सपना माना जाता है।
एक अपना आशियाना… जहाँ दीवारों पर अपनी यादें हों,
जहाँ छत अपनी हो, और जहाँ हर सुबह एक नयी उम्मीद लेकर आए।

लेकिन आज की हकीकत इस सपने से बहुत अलग है।
महंगाई ने घर को एक ऐसी मंज़िल बना दिया है, जहाँ पहुँचने के लिए सिर्फ मेहनत नहीं,
बल्कि किस्मत, कमाई और समय—तीनों का साथ चाहिए।

बहुत लोग दिल में घर का सपना लिए बड़े होते हैं,
लेकिन जैसे ही ज़िंदगी जिम्मेदारियों में उलझती है,
सपनों और हकीकत के बीच की दूरी बढ़ती जाती है।

कीमतें इतनी तेज़ी से ऊपर जा रही हैं कि
एक आम इंसान की पूरी कमाई भी उस सपने का सिर्फ एक हिस्सा ही छू पाती है।
EMI का डर, बुढ़ापे की चिंता, बच्चों की पढ़ाई, नौकरी की अनिश्चितता—
ये सब मिलकर उस सपने को और दूर धकेल देते हैं।

लोग कहते हैं—
“घर तो चाहिए, पर कैसे?”
यही सवाल आज लाखों लोग खुद से पूछते हैं।

कई परिवारों के लिए घर सिर्फ एक जगह नहीं होता—
वह उनकी मेहनत का सम्मान, उनकी सुरक्षा, उनकी पहचान होता है।
और जब यह सपना महंगाई की सीढ़ियों पर अटक जाता है,
तो दिल टूटता है… चुपचाप, बिना आवाज़ के।

कभी-कभी सबसे बड़ा दर्द यह नहीं होता कि सपना पूरा नहीं हुआ…
बल्कि यह होता है कि आपने पूरी कोशिश की—
फिर भी ज़िंदगी एक कदम आगे खड़ी रही।

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