जब देश में caste-based debates और political narratives लगातार तेज़ हो रहे हैं, उसी समय Chief Justice of India Surya Kant का यह कहना —
“Caste must not be allowed to divide us, whatever the circumstance”
— सिर्फ एक legal observation नहीं बल्कि एक moral direction भी है।
यह remark Maharashtra में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों के संदर्भ में आया, जहाँ OBC political reservation का मुद्दा Supreme Court के सामने था। Hearing के अंत में CJI ने साफ कहा कि समाज को जाति के नाम पर बाँटने का कोई भी प्रयास लंबे समय में किसी के लिए भी अच्छा नहीं है।
🌍 1) इस बयान का संदर्भ क्या है?
Supreme Court में एक Bench political reservation for OBCs पर arguments सुन रही थी। महाराष्ट्र में कई local bodies के चुनाव pending थे, और राज्य सरकार OBC quota के साथ चुनाव कराना चाहती थी।
इसी बीच यह कहा गया कि Union Government caste census पर विचार कर रही है।
यहीं पर CJI Surya Kant ने अपना key remark दिया:
“Caste must not be allowed to divide us, whatever the circumstance.”
यह एक timely warning भी है और एक constitutional reminder भी —
कि caste एक social reality है,
लेकिन उसे political division का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
⚖️ 2) Judiciary का दृष्टिकोण: Balancing Social Justice & Unity
India में caste-based inequalities एक painful truth हैं।
इसीलिए संविधान में reservations और affirmative action को जगह दी गई है।
लेकिन CJI Kant का संदेश यह स्पष्ट करता है कि:
- caste को पहचानना अलग बात है
- और जाति के नाम पर society को polarize करना अलग
Judiciary लगातार इस बात को maintain करती है कि social justice reforms समाज को empower करें, divide नहीं करें।
🗳️ 3) Maharashtra Local Body Elections: What’s the core issue?
महाराष्ट्र में स्थानीय चुनाव काफी समय से टल रहे थे क्योंकि:
- OBC reservation का empirical data pending था
- triple test formula पूरा नहीं हुआ था
- State Election Commission को clarity नहीं थी
Supreme Court सुनवाई कर रही थी कि क्या elections without reservation हों, या reservation के साथ delay किया जाए।
Bench ने संकेत दिया:
- चुनाव चल सकते हैं,
- लेकिन final outcome Court के decision पर dependent रहेगा।
यही backdrop था जिसमें caste census discussion उठा — और CJI ने अपने remark से broader message दे दिया।
🧩 4) Why This Statement Is Important Today
India अभी एक ऐसे phase से गुजर रहा है जहाँ:
- caste census देश की बड़ी political debate है
- कई parties caste arithmetic को electoral strategy बना रही हैं
- social media पर caste-based narratives तेजी से फैलते हैं
ऐसे माहौल में देश के सबसे उच्च न्यायिक पद से यह कहना:
हमारा समाज जाति की दीवारों में नहीं बँटना चाहिए
— एक बहुत powerful message है।
यह reminder है कि identity politics अगर limit से ज़्यादा बढ़े, तो development, unity और trust erode हो जाते हैं।
🫂 5) Caste: Reality भी, Responsibility भी
CJI Kant का remark यह कहता है कि caste एक historical और social structure है,
पर हमें इसे इस तरह नहीं चलने देना चाहिए कि यह:
- communities को एक-दूसरे से दूर कर दे
- elections को solely caste counts में बदल दे
- governance को caste equations का hostage बना दे
Reservation का उद्देश्य upliftment है,
segregation नहीं।
📌 Final Thought
Caste census, OBC reservation, political mobilisation — ये सब debates खुद में जरूरी हैं,
पर इन debates के बीच में CJI Surya Kant का यह कहना:
“Caste must not be allowed to divide us.”
— पूरे सामाजिक discourse का tone reset करता है।
यह हमें याद दिलाता है कि एक diverse देश को आगे बढ़ाने का रास्ता caste lines से नहीं,
constitutional values, equality और mutual respect से निकलता है।
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FAQ
CJI Surya Kant ने Supreme Court की सुनवाई के दौरान कहा कि समाज को जाति के आधार पर बाँटना सही दिशा नहीं है और अधिकारों या अवसरों का निर्धारण जातीय पहचान के बजाय सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों पर होना चाहिए।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि OBC आरक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी, डेटा-आधारित और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए।
CJI Surya Kant की टिप्पणी caste census बहस को एक नई दिशा देती है, क्योंकि यह बताती है कि जातीय डेटा का इस्तेमाल समाज में और अधिक विभाजन पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए।
उनका जोर इस बात पर था कि किसी भी नीति का उद्देश्य सामाजिक एकता और बराबरी को बढ़ाना होना चाहिए।
इस remark के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि caste census के डेटा का उपयोग किस तरह और किन उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।
Maharashtra में स्थानीय निकाय चुनावों में OBC को राजनीतिक आरक्षण देने का मुद्दा 2021 से विवाद में है।
Supreme Court ने पहले कहा था कि राज्य सरकार “triple test” पूरा किए बिना OBC आरक्षण लागू नहीं कर सकती—
स्थानीय स्तर पर OBC की सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर empirical डेटा,
कुल आरक्षण सीमा 50% से न बढ़े,
OBC quota scientific तरीके से निर्धारित हो।
इस डेटा की कमी के कारण OBC आरक्षण रोक दिया गया था।
इसके बाद राज्य सरकार caste census और empirical रिपोर्ट जमा करने की प्रक्रिया में लगी हुई है, और इसी संदर्भ में यह सुनवाई हो रही है।
Supreme Court ने स्पष्ट कहा कि चुनाव अनिश्चित काल तक नहीं टाले जा सकते और चुनाव आयोग को समय पर स्थानीय निकाय चुनाव कराना अनिवार्य है।
यदि OBC आरक्षण का डेटा “triple test” पूरा नहीं करता, तो चुनाव बिना OBC quota के भी कराए जा सकते हैं।
इससे दो प्रभाव पड़ते हैं:
राजनीतिक स्थिति बदल सकती है, क्योंकि कई क्षेत्रों में OBC राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
राज्य सरकार पर दबाव बढ़ता है कि वह जल्द से जल्द सही डेटा तैयार करके कोर्ट में प्रस्तुत करे।

