मैं शिक्षक नहीं हूँ।
मेरे पास शिक्षा शास्त्र, बाल मनोविज्ञान, या अकादमिक प्रशासन में कोई प्रशिक्षण नहीं है।
हाँ, मैं फीस की रसीदें देखता रहा हूँ।
साल दर साल।
वही पहले के तीनों को मिलाकर भी कहीं ज्यादा भारी अनुभव है —
और जिसने धीरे-धीरे यह समझा दिया है कि
स्कूल अब पढ़ाते कम हैं, समझाते ज्यादा हैं —
कि आपको क्यों इतना पैसा देना चाहिए।
जब स्कूल बने थे, तो उनका काम था पढ़ाना।
जब स्कूल बढ़े, तो उनका काम हुआ सिखाना।
और जब स्कूल “ब्रांड” बने, तो उनका काम हो गया — बेचना।
आज का स्कूल एक अजीब जगह है।
जहाँ admission form भरते वक्त ही आपको यह एहसास दिला दिया जाता है कि
आप किसी संस्था में नहीं,
एक premium ecosystem में प्रवेश ले रहे हैं।
एयर कंडीशनर, डिजिटल बोर्ड, activity room, robotics lab, international curriculum —
हर चीज़ मौजूद है।
बस एक चीज़ थोड़ी कम है —
सवाल पूछने की आज़ादी।
फीस हर साल बढ़ती है।
इतनी नियमितता से कि मौसम भी शर्मिंदा हो जाए।
कारण भी उतने ही दिलचस्प होते हैं:
“Development charges”
“Annual activity fees”
“Technology upgrade”
और कभी-कभी तो सिर्फ एक नोटिस।
मजेदार यह है कि syllabus वही रहता है।
किताबें बदलती हैं, concept नहीं।
और teaching method — वह तो सालों से स्थिर है,
जैसे किसी museum में रखा हो।
इस पूरे खेल में सबसे सुंदर चीज़ है — perception।
महंगा स्कूल = अच्छा स्कूल।
यह equation इतनी बार दोहराई गई है कि अब यह सच लगने लगी है।
कोई यह नहीं पूछता कि बच्चे ने क्या सीखा।
बस यह देखा जाता है कि स्कूल कितना “प्रेजेंटेबल” है।
यहाँ से शिक्षा धीरे-धीरे industry बनती है।
क्योंकि जब कोई चीज़ जरूरत से ज्यादा सजने लगे,
तो समझ लीजिए कि वह बिकने लगी है।
स्कूल अब बच्चों के लिए नहीं बनते।
वे parents के लिए design होते हैं।
Open house में presentation चलता है।
Achievements की स्लाइड्स दिखाई जाती हैं।
और बड़े सलीके से यह बताया जाता है कि
अगर आपका बच्चा यहाँ नहीं पढ़ा,
तो वह पीछे रह जाएगा।
डर बेचना एक कला है।
और स्कूल इसमें अब काफ़ी निपुण हो चुके हैं।
इस सिस्टम में सबसे दिलचस्प किरदार है — बच्चा।
जो न फीस तय करता है,
न syllabus चुनता है,
न यह समझता है कि यह सब क्यों हो रहा है।
वह बस adapt करता है।
बैग उठाता है।
Classes attend करता है।
Tests देता है।
और धीरे-धीरे सीख जाता है कि
learning से ज्यादा important है —
perform करना।
माता-पिता भी कम दिलचस्प नहीं हैं।
वे कहते हैं: “हम बच्चे के लिए best चाहते हैं।”
और “best” की परिभाषा quietly बदल जाती है:
- बड़ा campus
- अंग्रेज़ी accent
- annual function का stage
- और report card में अच्छे marks
कभी-कभी लगता है,
हम बच्चे को नहीं,
उसकी future image को educate कर रहे हैं।
यहाँ एक और दिलचस्प पैटर्न है।
जितना ज्यादा पैसा,
उतना ज्यादा pressure।
क्योंकि investment जितना बड़ा होगा,
expectation उतनी ही भारी होगी।
“इतनी फीस दी है, कुछ बनना चाहिए…”
यह वाक्य धीरे-धीरे motivation नहीं,
भार बन जाता है।
और फिर हम पूछते हैं —
बच्चे stress में क्यों हैं?
इस पूरी कहानी में कोई villain नहीं है।
स्कूल business कर रहे हैं।
Parents investment कर रहे हैं।
और बच्चे… system का हिस्सा बन रहे हैं।
सब कुछ perfectly logical है।
और शायद इसी वजह से —
सब कुछ थोड़ा खतरनाक भी है।
यहाँ diagnosis बहुत जटिल नहीं है।
इसके लिए न कोई education policy पढ़नी पड़ेगी,
न कोई research paper।
बस इतना समझना काफी है:
जब शिक्षा “ज़रूरत” से “product” बन जाती है,
तो उसका मकसद बदल जाता है।
अंत में बात बहुत सीधी है।
हमने स्कूल को इतना “perfect” बना दिया है कि
वह असली काम भूल गया है।
जो जगह जिज्ञासा पैदा करने के लिए बनी थी,
वह अब तुलना पैदा कर रही है।
और जो सिस्टम तुलना पर चलता है,
वह कभी संतुष्ट नहीं होता।
ना parents।
ना बच्चे।
और शायद —
ना ही स्कूल।

