भारतीय परिवारों में एक अनकही परंपरा सदियों से चली आ रही है – बड़ा बेटा घर का वारिस नहीं सिर्फ होता, बल्कि घर का आधार बन जाता है। जन्म से ही उसके कंधों पर एक अदृश्य बोझ लाद दिया जाता है। वो बोझ जो न दिखता है, न वजन में तौला जा सकता है, लेकिन जो रातों की नींद हराम कर देता है, सपनों को कुचल देता है और जिंदगी को एक जिम्मेदारी की लंबी दौड़ बना देता है। ये कहानी हर उस बड़े बेटे की है जो चुपचाप सब सहता है, मुस्कुराकर सब निभाता है, लेकिन अंदर से टूटता रहता है। ये कहानी मेरी भी है, आपकी भी हो सकती है, और लाखों भारतीय घरों में रहने वाले उन बड़े बेटों की है जिनके हिस्से में हमेशा “जिम्मेदारी” ही आती है।
बचपन से ही बड़ा बेटा अलग होता है। छोटे भाई-बहनों के लिए वो खेल का साथी होता है, लेकिन माता-पिता की नजर में वो “बड़ा हो रहा है”। जहां छोटे को डांट पड़ती है तो बड़ा समझाया जाता है – “तू बड़ा है न, समझदार बन।” जहां छोटी बहन को नई ड्रेस मिलती है, बड़े को पुरानी किताबें थमा दी जाती हैं – “तेरे लिए बाद में लेंगे, पहले छोटों का देख।” ये छोटी-छोटी बातें बचपन में मजाक लगती हैं, लेकिन बड़े होने पर ये एक पैटर्न बन जाती हैं। बड़ा बेटा सीख जाता है कि उसकी खुशी परिवार की खुशी के बाद आती है। वो सीख जाता है कि रोना नहीं, सहना है।
मैं याद करता हूं अपना बचपन। हम चार भाई-बहन थे। मैं सबसे बड़ा। पिताजी एक छोटी सी नौकरी करते थे, मां घर संभालती थीं। जब मैं दसवीं में था, तब छोटे भाई की फीस नहीं भर पाए थे। पिताजी ने मुझे बुलाया और कहा, “बेटा, तू बड़ा है, समझ। इस बार तेरी साइकिल नहीं आएगी, छोटे की फीस पहले भरनी है।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है पापा।” लेकिन रात को तकिए में मुंह छिपाकर रोया था। वो साइकिल नहीं आई कभी। नई किताबें नहीं आईं, पुरानी उधार की पढ़ीं। लेकिन मैंने कभी शिकायत नहीं की। क्योंकि मुझे लगा – मैं बड़ा हूं, मेरी जिम्मेदारी है।
ये जिम्मेदारी कब बोझ बन जाती है, पता ही नहीं चलता। कॉलेज के दिनों में दोस्त पार्टी करते थे, घूमते थे, लेकिन मैं ट्यूशन पढ़ाता था। छोटे भाई-बहनों की फीस, घर का राशन, मां की दवाइयां – सब मेरी कमाई से। पिताजी की नौकरी चली गई थी। मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ दी। दोस्तों ने कहा, “पागल है क्या?” मैंने कहा, “घर की जरूरत है।” लेकिन अंदर से टूट रहा था। सपने देखे थे बड़े-बड़े – अच्छी नौकरी, विदेश जाना, अपना घर। लेकिन सब दब गए जिम्मेदारी के बोझ तले।
भारतीय समाज में बड़ा बेटा सिर्फ बेटा नहीं होता, वो परिवार का स्तंभ बन जाता है। पिताजी बूढ़े हों तो उनकी देखभाल, मां बीमार हों तो दवाइयां, बहनों की शादी, भाइयों की पढ़ाई – सब उसके हिस्से। लोग तारीफ करते हैं – “कितना जिम्मेदार लड़का है!” लेकिन कोई नहीं पूछता – “तू ठीक तो है न?” कोई नहीं देखता कि रात को वो अकेले बैठकर सिगरेट पीता है, तनाव से भरा हुआ। कोई नहीं जानता कि उसकी शादी में देरी इसलिए हुई क्योंकि बहनों की शादी पहले करनी थी। कोई नहीं समझता कि वो अपनी पत्नी से कहता है, “सॉरी, इस बार घूमने नहीं जा पाएंगे, घर का लोन चुकाना है।”
एक बार की बात है। मेरी शादी के बाद पत्नी ने कहा, “चलो हनीमून पर चलते हैं।” मैंने कहा, “अभी नहीं, छोटे भाई की नौकरी लगी है, उसे सेट होने दो।” वो चुप हो गई। लेकिन रात को मैंने देखा, वो रो रही थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” उसने कहा, “तुम हमेशा परिवार पहले, खुद बाद में। कभी हमारा भी सोचो।” मैं कुछ नहीं बोल सका। क्योंकि सच तो ये था कि मैं खुद को भूल चुका था।
बड़े बेटे की जिंदगी में प्यार भी जिम्मेदारी बन जाता है। वो पत्नी से कहता है, “मां-पापा हमारे साथ रहेंगे।” वो बच्चों को कहता है, “छोटे चाचा की मदद करो।” वो खुद कभी नहीं कहता, “मैं थक गया हूं।” क्योंकि अगर वो थक गया तो घर गिर जाएगा। समाज कहता है – “बड़ा बेटा घर का चिराग होता है।” लेकिन चिराग जलता है तो खुद जलता है न। उसकी लौ दूसरों को रोशनी देती है, लेकिन खुद खत्म हो जाती है।
कई बार बड़ा बेटा अकेला पड़ जाता है। छोटे भाई-बहन बड़े होकर अपनी जिंदगी बना लेते हैं। नई कार, नया घर, विदेश टूर। लेकिन बड़ा वही पुराना घर संभालता रहता है। फोन पर छोटा भाई कहता है, “भैया, मां की दवाई का पैसा भेज दो।” बड़ा भेज देता है। लेकिन कोई नहीं पूछता, “भैया, तुम्हारी तबीयत कैसी है?” बड़ा बेटा मुस्कुराता है और कहता है, “सब ठीक है।”
ये बोझ सिर्फ आर्थिक नहीं होता, भावनात्मक भी होता है। बड़ा बेटा कभी गलती नहीं कर सकता। अगर वो गलत नौकरी चुन ले, तो कहा जाता है – “बड़ा होकर भी समझ नहीं।” अगर शादी देर से करे, तो ताना – “घर की जिम्मेदारी नहीं समझता।” अगर थोड़ा आराम करना चाहे, तो इल्जाम – “स्वार्थी हो गया है।” वो कभी नहीं कहता कि मैं भी इंसान हूं। मुझे भी सपने हैं, आरजूएं हैं, थकान है।
एक सर्वे में पढ़ा था कि भारतीय परिवारों में बड़े बेटों में डिप्रेशन की दर सबसे ज्यादा होती है। वो चुपचाप सहते हैं, क्योंकि बोलें तो कौन सुनेगा? समाज तो कहेगा – “मर्द है, सह लेगा।” लेकिन मर्द भी टूटता है। कई बड़े बेटे शराब के आदी हो जाते हैं, कई चुपचाप बीमार पड़ जाते हैं। दिल का दौरा, हाई ब्लड प्रेशर – सब जिम्मेदारी का नतीजा। लेकिन मौत के बाद भी तारीफ – “कितना जिम्मेदार था!”
क्या ये सही है? क्या बड़ा बेटा सिर्फ जिम्मेदारी के लिए पैदा होता है? क्या उसकी खुशी, उसके सपने महत्व नहीं रखते? आज का दौर बदल रहा है। कई परिवारों में अब सब बराबर बांटते हैं। बहनें भी आगे आ रही हैं, छोटे भाई भी जिम्मेदारी समझ रहे हैं। लेकिन अभी भी लाखों घरों में बड़ा बेटा अकेला लड़ रहा है।
मैं अपने बड़े बेटे से कहता हूं – बेटा, जिम्मेदारी निभाओ, लेकिन खुद को मत भूलो। परिवार महत्वपूर्ण है, लेकिन तुम भी हो। थक जाओ तो रुको, रोना चाहो तो रो लो। तुम्हारा दर्द भी उतना ही कीमती है जितना दूसरों का सुख।
और माता-पिता से कहता हूं – अपने बड़े बेटे को सिर्फ जिम्मेदारी मत सौंपो, प्यार भी दो। पूछो उसकी खुशी का, उसके सपनों का। वो तुम्हारा बेटा है, बोझ ढोने की मशीन नहीं।
ये लेख उन सभी बड़े बेटों को समर्पित है जो चुपचाप सब सह रहे हैं। तुम मजबूत हो, लेकिन मजबूती की भी एक हद होती है। कभी खुद से कहो – “मैं भी महत्वपूर्ण हूं।” और अगर कोई सुन रहा हो तो बोलो – “मैं थक गया हूं।”
क्योंकि घर की जिम्मेदारी बड़े बेटे के हिस्से में आती जरूर है, लेकिन उसकी जिंदगी सिर्फ जिम्मेदारी नहीं है। वो भी जीने का हक रखता है।
