An empty office chair with a box of belongings symbolizing layoff stress and emotional impact.
Empty Chair After Layoff – An Emotional Corporate Moment

Layoff क्यों होते हैं? क्या ये सच में ज़रूरी हैं?—एक भावनात्मक सच्चाई

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यह सवाल पूछना आज बेहद ज़रूरी है—
“आख़िर Layoff क्यों?”
“क्या ये सच में ज़रूरी होते हैं?”

कागज़ों पर लिखी हुई कंपनी की गणनाएँ कभी-कभी इंसानों की भावनाओं को नहीं समझ पातीं। Layoff सिर्फ एक बिज़नेस डिसीजन नहीं होता—यह किसी की पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल देता है। कोई अपनी EMI सोचता है, कोई बच्चों की फीस, कोई माता-पिता की दवाइयाँ… और अचानक एक ईमेल उसकी दुनिया हिला देता है।

कहा जाता है—“यह कंपनी के बेहतर भविष्य के लिए है।”
लेकिन उस इंसान का क्या, जिसने अपनी रातें जागकर उसी कंपनी का हर मुश्किल वक्त में साथ दिया?
उसकी मेहनत, उसका संघर्ष, उसकी उम्मीदें—इन सबका हिसाब कौन रखता है?

Layoff से सिर्फ नौकरी नहीं जाती,
एक आत्मविश्वास टूट जाता है,
एक पहचान हिल जाती है,
और सबसे ज़्यादा दर्द देता है वो खालीपन,
जहाँ कल तक काम, सपने और योजनाएँ हुआ करती थीं।

कहते हैं—“बिज़नेस में भावनाएँ नहीं चलतीं।”
पर एक सच यह भी है कि
हर बिज़नेस को चलाते इंसान ही हैं—और उनके दिल भी होते हैं।

शायद Layoff कभी-कभी ज़रूरी भी बन जाते हों,
लेकिन हर बार ज़रूरी यह है कि
इंसानियत बची रहे।
सम्मान बचा रहे।
और किसी के संघर्ष को सिर्फ एक फ़ाइल या नंबर समझकर बंद न कर दिया जाए।

अगर आप भी इस दौर से गुज़र रहे हैं—
जान लीजिए,
आपकी क़ीमत एक नौकरी से कहीं ज़्यादा है।
ये मुश्किल वक्त है, पर हमेशा नहीं रहेगा।
नए रास्ते हमेशा मिलते हैं—और आपके भीतर अभी भी वही क्षमता है जो पहले थी।

हिम्मत रखिए।
आप अकेले नहीं हैं।

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