रिश्तों की दुनिया बड़ी अजीब होती है। कभी हम किसी को इतना करीब आने देते हैं कि अपना हर एहसास, हर कमजोरी तक उन्हें दिखा देते हैं। लेकिन जब वही लोग हमारी नज़दीकियों की क़द्र नहीं करते, तो दिल अनजाने में ही थकने लगता है।
कभी-कभी दूरी बनाना मजबूरी नहीं होती—एक ज़रूरी फैसला होता है। क्योंकि बार-बार टूटने से अच्छा है, एक बार ठहरकर अपनी शांति को चुन लिया जाए।
लोग बदल जाते हैं, रवैये बदल जाते हैं, लेकिन दिल पर लगी चोटें उतनी जल्दी नहीं बदलतीं। इसलिए उन लोगों से दूर रहना ही समझदारी है, जो पास रहकर भी हमें कभी समझ नहीं पाए।
दूरी हमेशा रिश्ता खत्म नहीं करती—कभी-कभी वही रिश्ता बचा लेती है, क्योंकि जब सम्मान, समझ और कद्र ख़त्म हो जाए, तो नज़दीकियों का कोई मतलब नहीं रहता।
अंत में इतना ही—
दिल को बचाना भी एक हुनर है।

