A person standing on a balcony looking at a polluted, busy city while thinking about buying a house
पैसा है, पर सुकून की तलाश अब भी जारी है।

पैसे होने के बाद भी लोग घर क्यों नहीं लेना चाहते? वजह सिर्फ महंगाई नहीं है

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आज के समय में ज़िंदगी बहुत बदल चुकी है।
पहले जो लोग कहते थे—“एक बार पैसा हो जाए, तो सबसे पहले घर लेंगे”—
अब वही लोग सोचते हैं कि घर लेना ही समझदारी नहीं है।

कई लोगों के पास अच्छी कमाई है, बचत है, और क्षमता भी कि वो घर खरीद सकते हैं।
लेकिन फिर भी वे रुक जाते हैं…
क्योंकि उनके लिए घर सिर्फ दीवारें और छत नहीं—
बल्कि एक बंधन, एक जिम्मेदारी, और एक लंबी EMI का सफ़र बन सकता है।

बड़े शहरों की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी ने लोगों से उनका सुकून छीन लिया है।
सुबह की शुरुआत ट्रैफिक से होती है,
दिन का अंत प्रदूषण से भरे आसमान के नीचे होता है,
और बीच का वक्त भागदौड़ में निकल जाता है।

लोग कहते हैं—
“घर मिलेगा तो अच्छा लगेगा, लेकिन क्या हमें सुकून मिलेगा?”

प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि कई लोग घर से ज्यादा
एक ऐसे माहौल की तलाश में हैं जहाँ सांस बिना डर के ली जा सके।
ट्रैफिक ने लोगों के घंटों चुरा लिए हैं—
वो वक्त जो वे परिवार के साथ, अपने सपनों के साथ, या खुद के साथ बिताना चाहते थे।

और महंगाई…
महंगाई ने घर को एक ऐसी पहेली बना दिया है
जहाँ EMI, मेंटेनेंस, टैक्स, सोसाइटी चार्जेस—
सब मिलकर मन को डराते हैं।

कई लोग कहते हैं—
“हम पैसे कमा रहे हैं, पर क्या हम जी भी रहे हैं?”

यही वजह है कि लोग अब आज़ादी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
उन्हें लगता है कि किराये पर रहकर लचीलापन मिलता है—
जगह बदली, माहौल बदला, नौकरी बदली;
पर घर लेने के बाद ये आज़ादी धीरे-धीरे खो जाती है।

कभी-कभी पैसा बहुत कुछ दे देता है,
पर एक शांत मन, धीमी ज़िंदगी और ढलती शाम का सुकून—
ये आज भी सबसे बड़े खज़ाने हैं।

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