कभी-कभी मन इतना थक जाता है कि बोलने का मन भी नहीं करता। चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है, लेकिन भीतर कहीं एक हल्की-सी खामोशी लगातार साथ चलती रहती है। बाहर से हम जितने सामान्य दिखते हैं, अंदर उतना ही कुछ टूटता और जुड़ता रहता है—बस हम दुनिया को बताना नहीं चाहते।
ज़िंदगी की सबसे कठिन बात यह नहीं कि हालात बदल जाते हैं, बल्कि यह कि हम उन सबके बीच भी खुद को संभालते हुए सामान्य बने रहने की कोशिश करते रहते हैं।
भीड़ भरी दुनिया में चलते हुए भी एक खालीपन दिल के किसी कोने से टकराता रहता है—बिना आवाज़, बिना शिकायत।
कुछ रिश्ते वक़्त के साथ दूर नहीं होते; वे बस दिल के अंदर चुपचाप जगह बना लेते हैं। उनकी यादें कभी दर्द देती हैं, कभी सुकून… और कई बार दोनों एक साथ।
यादें ऐसी ही होती हैं—ना पूरी तरह छोड़ती हैं, ना पूरी तरह साथ देती हैं।
हम अपनी कई लड़ाइयाँ ख़ामोशी में लड़ते हैं—
न कोई ग़ुस्सा,
न कोई सवाल,
बस एक धीमा-सा संघर्ष… जिसे शायद ही कोई समझ पाता है।
फिर भी, इसी सफ़र में हम धीरे-धीरे खुद को दोबारा उठाना सीख जाते हैं।
दर्द हमें बदलता है, और बदलाव हमें मजबूत बनाता है।
अगर आज मन भारी है, तो उसे रहने दो…
कभी-कभी रुक जाना भी ज़रूरी होता है,
ताकि हम खुद को फिर से महसूस कर सकें—और थोड़ा-थोड़ा ठीक हो सकें।

