आजकल शादियाँ एक दिन का ऐसा इवेंट बनती जा रही हैं, जिसमें लोग अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं—पैसा, समय, मेहनत… सब कुछ।
स्टेज चमकता है, रोशनी दमकती है, खाना महकता है—और कुछ ही घंटों के लिए ऐसा लगता है जैसे दुनिया बस इसी पल पर टिक गई हो।
लेकिन सच यह है कि इन कुछ घंटों की चमक के पीछे एक सवाल हमेशा चुपचाप खड़ा रहता है:
क्या रिश्ता भी इतनी ही रोशनी में जियेगा जितनी हम इस इवेंट पर खर्च कर देते हैं?
दिखावे की इस दौड़ में हम अक्सर भूल जाते हैं कि शादी की असली खूबसूरती खर्च में नहीं, भावनाओं में होती है।
शादी को बड़ा बनाने से रिश्ता बड़ा नहीं हो जाता।
एक भव्य हॉल या कीमती सजावट उस warmth को कभी नहीं दे सकती जो दो दिलों की सच्ची समझ देती है।
कभी-कभी सोचने की बात यह भी है—
जिस ऊर्जा और पैसे को हम कुछ घंटों की चमक पर लगा देते हैं,
अगर वही अपने भविष्य, अपनी जिम्मेदारियों या अपने बच्चों की सुरक्षा में लगाया जाए,
तो वो आने वाले सालों में कहीं ज़्यादा काम आएगा।
क्योंकि शादी का असली इम्तिहान उस दिन नहीं होता जिस दिन मंडप सजता है—
वो उन दिनों में होता है जब जिंदगी मुश्किल होती है, जब समझ और साथ की ज़रूरत होती है।
रिश्ते को मजबूत बनाती हैं—
बातें, भरोसा, एहसास, और एक-दूसरे के लिए खड़े रहने की हिम्मत।
यह चीज़ें कभी किसी सजावट की कीमत पर नहीं बिकतीं और न किसी फंक्शन की भव्यता पर टिकती हैं।
शादी एक ऐसा सफर है जो एक दिन की भीड़ से नहीं, बल्कि रोज़ की छोटी-छोटी बातों से बनता है।
एक मुस्कान से, एक समझदारी भरे शब्द से, एक दूसरे को पकड़कर चलने की इच्छा से।
याद रखिए—
समय बीतने पर लोग फंक्शन नहीं याद रखते,
उन्हें याद रहता है कि रिश्ते में कैसा अपनापन था।
शादी चाहे बड़ी हो या छोटी—
दिल अगर सच्चे हों, तो घर खुद-ब-खुद रोशन हो जाता है।
बाकी सब… बस कुछ समय के लिए चमकने वाला शोर है।

